रोटावायरस क्या है इसके लक्षण और बचाव जानिए

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   रोटावायरस

रोटावायरस छोटे बच्चो में फैलने वाली एक गंभीर बीमारी है. जिसमे बच्चे के छोटी आंत में इन्फेक्शन फैल जाता है. यदि कोई बच्चा वायरस से संक्रमित है तो उसे बहुत ही पतले दस्त जाने लगते है. जिसकी वजह से शरीर मे पानी की कमी होने लगती है. जो कि अपने आप मे एक गंभीर समस्या है. पूरे विश्व मे इस वायरस से प्रभावित बच्चो का आकलन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है, यह वायरस उन देशों में अधिक प्रभावशाली है, जो विकासशील देशों की श्रेणी में आते है. Word Health Organisation ने 2013 में एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमे रोटावायरस से होने वाली बच्चो की मौत का आंकड़ा था. उस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2013 में ही रोटावायरस 215,000 बच्चों की मौत की वजह बनी थी. यह अपने आप मे बहुत ज्यादा थी. इसके बाद इस बीमारी से जुड़े आकड़ो को दुनियाँ के सामने नही रखा गया है. लेकिन यह रिपोर्ट इस बीमारी की गंभीरता को दर्शाती है. इस बीमारी से मुख्यतः 5 वर्ष तक के बच्चे अधिक प्रभावित पाए गए है. एक अनुमान के मुताबिक लगभग सभी बच्चे 5 वर्ष की उम्र तक इस बीमारी के चपेट में एक बार तो जरूर ही आ जाते है.

रोटावायरस क्या है?

रोटावायरस की संरचना को जब वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मदर्शी की मदद से देखा तो पाया कि, यह एक द्वि कोशकीय एक जीव है, जिसका आकार गोल है, या एक पहिये के समान है. लैटिन भाषा मे इस गोल आकार को Rota कहते है. इस वजह से इसका नाम रोटावायरस पड़ा.

रोटावायरस होने की मुख्य वजह क्या है?

रोटावायरस एक संक्रमण रोग है. इस बीमारी का प्रसार एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक किसी भी माध्यम से हो सकता है. यही कारण है कि यह अधिकतर इन देशों में पाया जाता है, जहां स्वच्छता का विशेष ध्यान नही रखा जाता है. इस श्रेणी में विकासशील देश आते है. रोटावायरस मुख्यतः पेट मे उपस्थित छोटी आंत पर प्रहार करता है, जिस वजह से आंतो में जठरांत्रशोथ हो जाता है. यह शोथ खाने के पाचन की प्रक्रिया को प्रभावित करने लगता है. जिस वजह से पाचन प्रणाली भोजन से पोषक तत्वों को अवशोषित नही कर पाती है. किया हुआ भोजन पचता नही है.

रोटावायरस को कैसे पकड़ा जा सकता है?

रोटावायरस एक संक्रमक रोग है, इसलिए इसकी पहचान करना जरूरी होता है, अन्यथा यह गंभीर रूप ले सकता है. रोटावायरस का प्रभाव, संक्रमित होने के कम से कम 10 दिन बाद दिखने शुरू हो जाते है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण मल परीक्षण के द्वारा मिल सकता है. 10 दिन बाद रोटावायरस मल के साथ आने लगते है.यदि कभी भी बच्चे को लगातार दस्त और उल्टी की शिकायत लगातार रहने लगे, तो यहरोटावायरस होने के लक्षण हो सकते है.

यह कितने प्रकार के होते है?

रोटावायरस को कुल 9 भागो में विभाजित किया गया है, जिन्हें क्रमशः रोटावायरस A,B,C,D,E,F,G,H,I कहते है. इंसान रोटावायरस के मुख्यतः 3 प्रकारों से प्रभावित होता है. जो कि रोटावायरस A,B और C है. रोटावायरस सिर्फ इंसानो तक ही सीमित नही है, इस वायरस के द्वारा जानवर भी प्रभावित होते है. जानवरो में रोटावायरस के लक्षण पाए जाते है. जानवर मुख्यतः रोटावायरस A और E से प्रभावित पाए जाते है. रोटावायरस E और H से प्रभावित जानवर मुख्यतः सुअर होते है. रोटावायरस D,E,F से अधिकतर पक्षी प्रभावित पाए गये है. रोटावायरस I से बिल्लियां प्रभावित होती है.

इसके लक्षण क्या है?

रोटावायरस की पहचान उसके लक्षणों के द्वारा की जा सकती है. यदि इन मे से कोई भी लक्षण बच्चे के अंदर दिखते है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. रोटावायरस के लक्षण इस प्रकार है.

  • रोटावायरस के प्रमुख लक्षणों में से एक उल्टी का होना है. रोटावायरस शरीर मे भोजन की प्रक्रिया को अवरूद्ध कर देता है. जिससे लगातार जी मिचलाने की समस्या, उल्टी जैसे समस्याएं दिखने लगती है.
  • इस बीमारी के चपेट में आने से पेट दर्द से जूझना पड़ता है. पेट मे मरोड़ उठना, इस बीमारी का एक आम लक्षण है.
  • रोटावायरस के प्रभाव में आने के बाद बच्चे को लगतार पतले दस्त आने लगते है. कुछ भी खाया हुआ पचता नही है.
  • शरीर से उल्टी और दस्त के माध्यम से लगातार पानी बाहर निकलता रहता है. जिस वजह से शरीर मे पानी की कमी हो जाती है.
  • इस वायरस के चपेट में आने के बाद स्वास संबंधी समस्याएं भी होने लगती है. जिस वजह से नाक बहना जैसी समस्याएं दिखती है.
  • खासी आने की समस्या भी इस वायरस के चपेट में आने के देखने को मिलता है.
  • इस वायरस से प्रभाव से बच्चे को बहुत तेज बुखार हो जाती है. यह बुखार 102० तक हो सकती है.
  • कभी कभी ऐसा भी देखने मे आता है, की बच्चे के मल से खून भी आने लगता है.
  • बच्चे के स्वभाव में वयवहारगत परिवर्तन देखने को मिलता है. बच्चे का स्वभाव चिड़चिड़ा होने लगता है, साथ ही वह सुस्त हो जाता है.

इससे बचने के लिए रखे जाने वाली सावधानियां:-

रोटावायरस एक ऐसा संक्रमण है, जिसका कोई इलाज तो नही है. इसका बचाव सिर्फ टीकाकरण के द्वारा ही संभव हो पाता है. लेकिन इस बीमारी में सावधानी ही सबसे बेहतर उपाय है. यदि कोई भी व्यक्ति आवश्यक सावधानियां रखता है, तो रोटावायरस की संभावना कम हो जाती है.

  • रोटावायरस, बीमारी फैलने की मुख्य वजह स्वच्छता का आभाव होता है. इससे बचाव का सबसे बेहतर उपाय यही है, की साफ सफाई का विशेष ध्यान रखे.
  • शौचालय के बाद साबुन से हाथ जरूर धोएं, और अपने बच्चो को भी यह करना सिखाएं. क्योंकि रोटावायरस मल में उपस्थित रहता है, और शौच के बाद यह वायरस हाथ मे लग जाता है. इसलिए हाथ धोना आवश्यक है.
  • जिस भी बच्चे को रोटावायरस हुआ हो तो उसे बाकी बच्चो से दूर रखें, अन्यथा वो भी इसके प्रभाव में आ सकते है. साथ रोगी के जब भी छुए, या उसके कपड़ो को छुए उसके बाद साबुन से हाथ धोना आवश्यक है. यह रोग छुआछूत से भी फैल जाता है.
  • कभी भी शिशु को दूध पिलाएं, उसके बाद हाथ अवश्य धोएं.
  • बच्चे के नैपी भी इस बीमारी के दौरान बार बार बदलनी पड़ती है. इसलिए कभी भी नैपी बदलने के बाद साबुन से हाथ धुलना न भूले. क्योंकि नैपी में भी यह वायरस फैल जाते है. इसके बाद यह आपके हाथों के द्वारा औरों में भी फैल सकता है.
  • जब भी खाना बनाएं उसके पहले साबुन से हाथ धुलने की आदत बना ले. यह काफी फायदेमंद होगा.

    रोटावायरस के क्या उपचार है?

इसका इलाज अपने आप मे जटिल होता है. इसकी वजह इसका कोई एक इलाज का न खोज पाना है. जब भी कोई इस वायरस से प्रभावित दिखाई देता है, तो सीधा रोटावायरस का इलाज करने के जगह इसके दिखने वाले लक्षणों का इलाज किया जाता है. रोटावायरस सेप्रभावित बच्चो में एक आम समस्या जो देखी जाती है, वो पानी की कमी हो जाना है. लगातार दस्त और उल्टी के कारण बच्चे के शरीर से पूरा पानी निकल जाता है, जिस वजह से बहुत ही जानलेवा स्थिति उत्पन्न हो जाती है. पानी की कमी की वजह से बच्चे की जान जा सकती है. इसलिए इसके प्राथमिक उपचार के तौर पर डॉक्टर, बच्चे को अतिरिक्त पानी की सप्लाई प्रारंभ कर देते है. जब भी कोई बच्चा रोटावायरस से प्रभावित दिखे, तो उसे ज्यादा से ज्यादा पानी पिलाएं.

इसके बचने के लिए टीकाकरण करवाये

इस बीमारी की गंभीरता हो देखते हुए वैज्ञानिकों द्वारा सबसे पहले एक वैक्सीन बनाया गया, जिसे रोटाशील्ड वैक्सीन के नाम से जानते है. लेकिन इस वैक्सीन के कुछ दुष्परिणाम सामने आने लगे. जैसे यह वैक्सीन छोटी आंत को प्रभावित करता था. इसकी वजह से छोटी आंत में समस्याएं आने लगी थी. इस वजह से यह वैक्सीन बंद करना पड़ा.

वर्तमान समय मे रोटावायरस के सिर्फ दो ही वैक्सीन उपलब्ध है. जिनके द्वारा इस वायरस को रोक जा सकता है.

1.रोटारिस्क वैक्सीन


2.
रोटाटेक वैक्सीन.

बच्चो को रोटावायरस से बचाने के लिए इन दो वैक्सीन का उपयोग किया जा सकता है. वैसे तो ये दोनों ही वैक्सीन बहुत फायदेमंद साबित हुए है, रोटावायरस के रोकथाम में. लेकिन फिर भी इन दोनों टीकाकरणों में कुछ मूलभूत अंतर है. लैक्टिस तत्व का उपलब्ध होना इन दोनों वैक्सीन में सबसे प्रमुख अंतर है.

रोटाटेक एक ऐसा वैक्सीन होता है, जिसमे लैटेक्स नामक तत्व पाया जाता है. जबकि रोटारिस्क में इस तत्व की मौजूदगी नही होती है. यह इस वजह से किया गया है, की कुछ बच्चो में देखने को मिलता है कि लैटेक्स तत्व से उन्हें एलर्जी होती है. इसलिए जिन बच्चो को इस तत्व से एलर्जी है, उन्हें लैटेक्स तत्व रहित वैक्सीन किया जाता है.

क्या टीकाकरण रोटावायरस से पूर्ण बचाव करता है?

ऐसा देखने मे आया है कि कई बच्चों को टीकाकरण कराया गया था, उसके बावजूद भी वो इससे प्रभावित हो गए थे. इस बात से यह निष्कर्ष निकाला गया कि रोटावायरस का वैक्सीन कराने के बाद ही यह पूर्णतः सुनिश्चित नही किया जा सकता है कि उस बच्चे को रोटावायरस नही होगा. कुछ आकड़ो के मुताबिक रोटावायरस का वैक्सीन इस वायरस से सिर्फ 80% ही बचाव कर पाने में सक्षम है. शेष 20% पूरे आसार रहते है कि बच्चा इसकी चपेट में आ सकता है. इसलिए कहा गया है, की इस बीमारी में बचाव ही सबसे उत्तम उपाय है. \

क्या रोटावायरस बच्चो को दोबारा हो सकता है?

इस बात की पूरी संभावना रहती है कि जो बच्चा एक बार वायरस से संक्रमित हो चुका है, वो दोबारा भी इसकी चपेट में आ सकता है. लेकिन यहाँ पर यह बात राहत देने वाली है कि दोबारा यह वायरस उतने खतरनाक प्रभाव नही दिखाता, जितना पहली बार मे दिखाता है, क्योंकि तब तक उस बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस वायरस से लड़ने में सक्षम हो जाती है.

इस प्रकार यह कहा जा सकता है, यह एक बहुत ही गंभीर बीमारी है, लेकिन थोड़ी सावधानी और सफाई के साथ इस बीमारी से लड़ा जा सकता है.

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