हार्ट मे पेसमेकर का उपयोग – Benefits Of Pacemaker In Hindi

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जाने हृदय व इससे जुड़े कुछ रोग व और्वेदिक उपचार के बारे में

पेसमेकर एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है जो हार्ट के रोग मे प्रयोग किया जाता  है | पेसमेकर का उपयोग हमारे दिल की धड़कन को निश्चित तरीके से धडकने के लिए किया जाता है | हमारे ह्रदय में स्थित साइनस नोड मनुष्य के ह्रदय में पेसमेकर की तरह ही काम करती है| साइनस नोड को मानव शरीर का प्राकृतिक पेसमेकर भी कहा जाता है | अगर इसमें किसी तरह की बाधा आ जाये तो शरीर को बहुत गंभीर समस्या का सामना करना पड़ सकता है , जिसको ठीक या फिर से स्वस्थ बनाने के लिए पेसमेकर की जरुरत पड़ती है |

पेसमेकर की मदद से हमारे ह्रदय की लय को नियंत्रित करने में मदद मिलती है | अगर किसी कारणवश आपके ह्रदय की गति धीमी हो गयी है तो आप इस यंत्र का प्रयोग करके अपनी इस समस्या से छुटकारा पा सकते है | यह हमारे ह्रदय में विद्युत संकेतों को नियंत्रित करता है |

आइये आज हम जानते है कि पेसमेकर के प्रकार के बारे में |

हार्ट पेसमेकर के प्रकार

वैसे पेसमेकर कई प्रकार के होते है | और सभी पेसमेकर का काम अलग अलग होता है | जैसे-

सिंगल कक्ष पेसमेकर – सिंगल कक्ष पेसमेकर में तार या लीड होते है | ये तार हमारी नशों या नाड़ी जनरेटर के दाएं वेंट्रिकल यानी हमारे ह्रदय के निचले कक्ष में स्तिथ होते है | यह विद्युत् पल्स को प्रसारित करता है |

ड्यूल-कक्ष पेसमेकर – ड्यूल-कक्ष पेसमेकर में भी लीड या तार होते है जो हमारे ह्रदय के दाये तरफ स्थित वेंट्रिकल और दाएं एट्रियम में पल्स को संचारित करने का कार्य करता है |

बाइवेन्ट्रिकुलर पेसमेकर – बाइवेन्ट्रिकुलर पेसमेकर के लीड व तार हमारे ह्रदय में एट्रियम और 2 वेंट्रिकल्स में प्रसारित करने का कार्य करता है |

इन सभी पेसमेकर को स्थायी रूप से या अस्थायी रूप से बदला या फिर हटाया जा सकता है |

आइये अब आइये जानते है कि कब होती है इसकी जरुरत|

हार्ट रोगी को कब होती है पेसमेकर सर्जरी की ज़रुरत

हार्ट ब्लॉक के कारण

अगर किसी व्यक्ति को हार्ट ब्लॉक की समस्या है तो उसके उपचार के लिए भी पेसमेकर की जरूरत होती है | जिससे हमारे ह्रदय में स्तिथ ब्लॉक की समस्या को खत्म किया जा सके |कभी कभी यह समस्या मनुष्य को जन्मजात होती है या फिर कभी यह समस्या ह्रदयघात की वजह से भी हमारे ह्रदय में इस प्रकार की समस्या होने लगती है |

लॉन्ग क्यूटी सिंड्रोम की वजह से

अगर किसी व्यक्ति को तनाव या फिर अधिक वयायाम के कारण दिल की धड़कन प्रभावित हो जाने की वजह से लॉन्ग क्यूटी सिंड्रोम की समस्या आने लगती है तो इस समस्या को दूर करने के लिए पेसमेकर या डीफिब्रिलेटर की सहायता लेकर हृदय की असामान्य लय को नियंत्रित करने में मदद मिलती है |

सिक साइनस सिंड्रोम की समस्या में

सिक साइनस सिंड्रोम जैसी समस्या को टैकी-ब्रैडी सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है | इस समस्या में थकावट, सांस फूलना, एनजाइना व घबराहट जैसी समस्या होने लगती है | इन सभी समस्या के कारण हमारे साइनस नोड पर असर पड़ता है | जिससे हमारे ह्रदय को ठीक करने के लिए पेसमेकर इम्प्लांट करना पड़ता है | इसके द्वारा हमारे ह्रदय की धड़कन को नियंत्रित किया जाता है |

कंजेस्टिव हार्ट फेलियर के कारण

कंजेस्टिव हार्ट फेलियर की परेशानी के कारण हमारे ह्रदय की पंप करने की क्षमता में कमी आ जाती है | इसी समस्या को ठीक करने के लिए हमारे ह्रदय में पेसमेकर को लगाया जाता है | जिससे धडकन को नियंत्रित किया जा सके |

कार्डिएक अरेस्ट की समस्या में

कार्डिएक अरेस्ट के कारण हमारे ह्रदय के इलेक्ट्रिक सिस्टम में परेशानी आने लगती है | जिसके कारण हमारे ह्रदय की धड़कन बंद होने लगती है | इस समस्या के उपचार के लिए हमारे शरीर को पेसमेकर की जरूरत पड़ती है |

अब आइये जानते है इसकी सर्जरी के बारे में

इस सर्जरी को करने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को एनेस्थीसिया दिया जाता है | एनेस्थीसिया के असर के बाद डॉक्टर नीडल का उपयोग करके पेसमेकर की तारों को नसों में डालते है | जिससे उस नीडल को व्यक्ति के ह्रदय में रखा जा सके | तारों को ह्रदय तक ले जाने के लिए डॉक्टर एक्स-रे मशीन का प्रयोग किया जाता है |

नीडल को लगाने के बाद व्यक्ति के पेट व सीने में चीरा लगाया जाता है | जिसके बाद चीरे के माध्यम से लेड वायर को रक्त वाहिका व ह्रदय में डाला जाता है | लेड वायर के ह्रदय में जाने के बाद चीरे में मध्यम से पेसमेकर को त्वचा के अंदर लगाया जाता है | फिर डॉक्टर द्वारा इसकी कई जाँच की जाती है | जाँच के बाद चीरे को सिल दिया जाता है |

दिल की सर्जरी के बाद रखे इन बातों का ध्यान:

  • इस सर्जरी के बाद मरीज़ को शारीरिक रूप से सक्रीय रहना चाहिए |
  • इस सर्जरी के बाद चक्कर आना, मतली आना, ज़्यादा पसीना आना, सीने में दर्द और इम्प्लांट के निवेशन की जगह से रक्तस्त्राव होने पर डॉक्टर से संपर्क करना|
  • नियमित रूप से अपने कार्डियोलॉजिस्ट डॉक्टर से जाँच करवाये |
  • इस सर्जरी के बाद हीट थेरेपी का उपयोग बिलकुल भी न करें |
  • सर्जरी के बाद अपनी बांह को ज़्यादा न हिलाएं। इम्प्लांट के बाद 6-8 हफ़्तों तक ज़्यादा भार न उठायें |
  • अगर सर्जरी के बाद आपको सांस लेने में कठिनाई हो रही है | तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करे |

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